एक आद‌मी के न होने से पूरी दुनिया कैसी खाली हो सकती है।

क्या इतना ही काफी नहीं होता अपने-आप को समझाने के लिए

एक आद‌मी के न होने से पूरी दुनिया कैसी खाली हो सकती है।"

                                                                                     -- दिव्य प्रकाश दुबे

जब हम किसी अपने को खो देते हैं, तो सिर्फ एक इंसान नहीं जाता, बल्कि उसके साथ जुड़ी हमारी पूरी दुनिया थम जाती है। ऐसा लगता है जैसे किसी ने चलती हुई फिल्म का प्लग खींच दिया हो। हर तरफ बस एक सन्नाटा और खालीपन महसूस होता है। लेकिन सवाल यह है कि क्या इस खालीपन के साथ जिया जा सकता है?

मौत और हमारी जिम्मेदारी

किसी का जाना हमें बताता है कि जिंदगी कितनी नाजुक है। लेकिन उस दुख के बीच एक बात और छिपी होती है—हमारी जिम्मेदारी।

 * जब हम होते हैं, तो हम किसी न किसी के लिए सहारा होते हैं।

 * हमारी मौजूदगी ही हमारे रिश्तों को जिंदा रखती है।

 * भले ही वो इंसान चला गया, पर हमारी हर सांस उनकी यादों और उनकी उम्मीदों को जिंदा रखने का जरिया है।

इकिगाई (Ikigai) की वो सीख

'इकिगाई' किताब में एक डॉक्टर का किस्सा है जो अपनी पत्नी के जाने के बाद बुरी तरह टूट गया था। तब उसे एक नई बात समझाई गई:

"सोचो, अगर तुम पहले चले जाते, तो तुम्हारी पत्नी पर क्या गुजरती? वो भी तो इसी दुख में तड़पती। तुमने खुद जीकर उसे इस बड़े दुख से बचा लिया।"

यही तो नजरिया है। दुख को सिर्फ 'पीड़ा' मत मानिए, इसे उस इंसान के प्रति अपना सम्मान और आखिरी सेवा मानिए।

जब घर में कोई न बचा हो

कई बार मन में ख्याल आता है—"अब तो कोई बचा ही नहीं, तो मैं किसके लिए जियूँ?"

देखिए, जिंदगी का मतलब सिर्फ दूसरों से नहीं जुड़ा होता।

 खुद की अहमियत: कभी-कभी सिर्फ अपना होना ही काफी होता है।

 अकेलापन बनाम सुकून: अकेले होने का मतलब यह नहीं कि आप अधूरे हैं। आप अपने शौक, अपने काम और छोटी-छोटी खुशियों (जैसे सुबह की चाय या डूबता सूरज) के लिए भी जी सकते हैं।

 जब तक आपकी सांस चल रही है, कुदरत चाहती है कि आप यहाँ रहें। यही आपकी सबसे बड़ी जिम्मेदारी है।

तूफ़ान और बदलाव

"कहते हैं कि जब आप किसी बड़े तूफ़ान से बाहर निकलते हैं, तो आप वही इंसान नहीं रहते जो तूफ़ान के अंदर गया था।" -- हारुकी मुराकामी

 * दुख एक तूफ़ान की तरह आता है, हमें अंदर तक हिला देता है, हमारी पुरानी आदतों को तोड़ देता है।

 * लेकिन जब यह थमता है, तो हम पहले से ज्यादा मजबूत और समझदार बनकर उभरते हैं। यह बदलाव ही हमें आगे बढ़ना सिखाता है।

निष्कर्ष

दिव्य प्रकाश दुबे की बात सच है—एक इंसान के जाने से दुनिया वाकई खाली हो जाती है। पर 'इकिगाई' हमें सिखाती है कि उस खालीपन में भी एक नया अर्थ ढूंढा जा सकता है। चाहे साथ निभाने वाला कोई हो या न हो, खुद का साथ निभाना और जीना सबसे जरूरी है।

जिंदा रहना उन लोगों के लिए सबसे बड़ा गिफ्ट है जो अब हमारे बीच नहीं रहे।

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